silk sericulture
 

भारत का रेशम

रेशम: रेशम, भारतीय जीवन एवं संस्कृति से जुड़ा हुआ है । यद्यपि भारत में सभी प्रकार के रेशम वस्त्र जैसे ड्रेस मैटिरियल, स्कार्फ/स्टोल, बने बनाए वस्त्र आदि तैयार किए जाते हैं किंतु रेशम की साडियां इन सबमें अनोखी है । साड़ी मानो रेशम का पर्याय-सा  हो  गया है ।  प्राचीन काल से यह भारतीय नारी का परंपरागत पहनावा है । भारतीय साहित्य में इसके असंख्य उल्लेख हैं और इसे पहनने की शैली में समय, क्षेत्र एवं व्यक्तिगत भिन्नता है ।  भारत की रेशमी साड़ियां देश के बुनकरों की शिल्पकारिता का ज्वलंत उदाहरण है ।

भारतीय बुनकरों की कलात्मकता एवं सौंदर्यबोध केवल रंगों तक ही सीमित नहीं है अपितु इसमें वनस्पतीय डिजाइन, सुंदर बुनावट, ज्यामिति टिकाऊपन का कार्य भी निहित है । बुनकर न केवल सूत बुनता है बल्कि उसमें उसकी संवेदना तथा भाव भी  शामिल होता है । भारत के अनेकों रेशम बुनाई केन्द्र अपनी श्रेष्ठ तथा विशिष्ट शैली एवं उत्पादों के लिए प्रख्यात हैं । भारतीय महिलाओं के लिए तो रेशम जैसे स्पर्श-मणि हो । रेशम बुनाई में क्षेत्र विशेष की जीवन रीतियां तथा संस्कृति अभिव्यक्त होती है । भारतीय महाद्वीप के कारीगर अपने-अपने ढंग से साड़ियों को बुनने में भावपरक डिजाइन, रंग एवं अपनी प्रतिभा को समाहित करते हुए कुशलता प्रदर्शित करने का भरपूर प्रयास करते हैं । बुनकर की रूचि के अनुसार प्रत्येक साड़ियों की डिजाइन अलग-अलग होती है । इस तरह इसमें असंख्य पैटर्न अथवा विविधता होती है । विशिष्ट डिज़ाइन एवं बुनाई के चलते कुछ केन्द्र अपना विशेष स्थान बना लिए हैं । भारत के विख्यात रेशम केन्द्र निम्‍न हैं :-

राज्यरेशम केन्द्र
1 आंध्र प्रदेश धरमावरम्, पोचमपल्ली, वेंकटगिरि, नारायण पेट
2 असम सुआलकुची
3 बिहार भागलपुर
4 गुजरात सूरत, कामबे
5 जम्मू व कश्मीर श्रीनगर
6 कर्नाटक बेंगलूर, आनेकल, इलकल, मोलकालपुरु,मेलकोटे,कोल्लेगाल
7 छत्तीसगढ़ चम्पा, चंदेरी, रायगढ़
8 महाराष्ट्र पैथान
9 तमिलनाडु कांचीपुरम, अरनी, सेलम, कुंबकोणम, तंजाउर
10 उत्तर प्रदेश वाराणसी
11 पश्चिम बंगाल बिष्णुपुर, मुर्शिदाबाद, बीरभूम
   


बनारस की ज़री

पवित्र गंगा नदी के किनारे स्थित वाराणसी, अपनी सुंदर रेशम साड़ियों एवं ज़री के लिए प्रख्यात है । ये साड़ियां हल्के रंग पर पत्ती, फूल, फल, पक्षी आदि की घनी बुनाई वाली डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध हैं । इन साड़ियों में क्लिष्ट बार्डर तथा अच्छी तरह का सजा पल्लू होता है । यह स्थान गाँज़ी  चांदी तथा सोने के तारों से बुनी हल्की साड़ियों के लिए भी विख्यात है । बनारस का कमखाब एक पौराणिक परिधान है । इसमें सोने तथा चांदी के धागों की सुनहरी बुनावट होती है । शुद्ध रेशम में सोने की कारीगरी को  बाफ्ता  कहते हैं और रंग-बिरंगे रेशम में महीन ज़री को आमरु ।

 

बांध कर रंगाई करने की कला

भारत में अवरोध रंगाई की तकनीकी सदियों से चली आ रही है ।  इस तकनीक की मुख्य दो परंपराएं है । पटोला अथवा ईकत तकनीक में धागों को बांधकर अवरोध-रंगाई की जाती है । बंधेज अथवा बंधिनी में वस्त्रों की रंगाई की जाती है ।

 

 

उड़ीसा का ईकत

उड़ीसा में बांधकर रंगाई करने एवं बुनने को ईकत के नाम से जाना जाता है जिसमें ताने एवं बाने को बांधकर अवरोध करते हुए रंगों को विकीर्ण किया जाता है । इस पद्धति की समग्र प्रस्तुति ब्रश की रंगाई जैसी प्रतीत होती है । ईकत की इस बुनाई में शहतूत एवं तसर दोनों इस्तेमाल में लाया जाता है ।

गुजरात का पटोला

पटोला अपनी सूक्ष्मता, बारीकी एवं सौंन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है । इसमें पांच या छह पारम्परिक रंगों जैसे लाल, जामुनी, नीला, हरा, काला या पीला के साथ अवरोध विधि से ताने एवं बाने को रंगा जाता है तथा बेहतरीन रंग एवं आकृति के धरातल पर ज्यामिति शैली की पूर्णता के साथ पक्षी, पुष्प, पशु, नर्तक-नर्तकी आदि का सौन्दर्य उभारा जाता है ।

 

बन्धेज का नृत्य प्रदर्शन

बन्धेज अथवा बंधिनी में महीने बुने हुए वस्त्र को कस कर बांध दिया जाता है तथा विशेष डिज़ाइन को बनाने के लिए रंगाई की जाती है । इन क्षेत्रों की साड़ी, ओढ़नी तथा पगड़ी में चमकीले रंगों का मिश्रण होता है । कूंछ की बंधिनी सूक्ष्म रूप से बंधी गांठ, रंगों की उत्कृष्टता तथा डिज़ाइन की पूर्णता में अद्वितीय है ।

गुजरात की तनछुई

तनछुई ज़री का नामकरण 3 पारसी भाइयों जिन्हें छुई के नाम से जाना जाता है, के नाम पर हुआ जिन्होंने इस कला को चीन में  सीखा  तथा सूरत में इसे प्रदर्शित किया । तनछुई ज़री में सामान्यतया गाढ़ी साटिन बुनाई, धरातल में बैंगनी या गाढ़ा रंग तथा पूरी डिज़ाइन में पुष्प, लता, पक्षी आदि का मूल भाव होता है ।

दक्षिण के मंदिर-क्षेत्र का रेशम

दक्षिण भारत, देश में रेशम उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी है तथा कांचीपुरम, धर्मावरम, आर्नी आदि की बुनाई के लिए प्रसिद्ध है ।  कांचीपुरम मंदिर-नगर के रूप में विख्यात है तथा यहां चाँदी अथवा सोने की ज़री के साथ चमकीले रंग की भारी साड़ियां महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं, बेंगलूर तथा मैसूर उत्कृष्ट प्रिन्टेड रेशम के केन्द्र के रूप में जाने जाते हैं ।  

हथकरघे पर बुनी हुई पारंपरिक साड़ियां बुनावट एवं डिज़ाइन की समृद्धि के लिए अलग ही स्थान रखती हैं जो सौन्दर्य एवं गुण में हमारे पुरातन गौरव को प्रतिष्ठित करती हैं ।  हथकरघे की बुनाई जीवन्त कला का बहुमुखी एवं सृजनात्मक प्रतीक है । आज, भारतीय रेशम खास तौर से हथकरघा उत्पादों के क्षेत्र में उत्कृष्ट तो है ही, साथ ही विश्वसनीय भी ।